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Sunday, December 20, 2009

रहें ना रहें हम, महका करेंगे....



खबर तो मुझे बहुत पहले ही मिल गयी थी अखबारों से, लेकिन देखने जाने का वक़्त निकाल ही नहीं पाया. और कल जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि मेरी यादों में इक्कीस साल तक बसा रहा वो टावर अब नहीं रहा. और तभी मुझे समझ आया कि यह टावर यादों में तो असल में आएगा अब ही.
यही तावेर जिसकी तस्वीर आपदेख रहे हैं, अब नहीं है. जैसा कि आप दूसरी तस्वीर में देख पा रहे हैं. खबर यह है कि बिजली की तारों में शॉर्ट सर्किट हो जाने के कारण इसमें करवा चौथ की रात आग लग गयी और चाँद देखने आयी संक्दों औरतों की मौजूदगी में टावर खाक हो गया. जले हुए टावर के अवशेष हटा दिए गए हैं. इसे फिर से नहीं बनाये जाने के पीछे सरकारी अफसरों के जो भी तर्क हों, मेरा तर्क है कि आवारगी के शुरूआती दौर कि मेरी यादों के साथ जुड़े रहे इस टावर को मैं बहुत याद करूँगा.
यह बात 1988 की है जब हम नए नए कालेज जाने लगे थे. बोटनी क्लास का लेक्चर बंक करके झील पर जान शुरू किया था. और तभी से झील के बीचोबीच बने टापू पर जाने की इच्छा उठी. वहां जाना मना था. टापू पर जाने का एक ही तरीका था और वह था किश्ती से जाना. लेकिन किश्ती टापू के पास रुकते ही सुखना झील के गार्ड मोटरबोट लेकर आ पहुँचते. टापू पर जाने की इच्छा बढती जा रही थी.
खैर, उन्हीं दिनों चंडीगढ़ की सुखना झील में आल इंडिया रोइंग चैम्पियनशिप हुयी थी. झील के आखिरी छोर तक देखने के लिए झील के बीचोबीच बने टापू पर यह निगरानी टावर बनाया गया था. और टापू पर जाने के लिए किश्तिओं को एक लाइन में खड़ा करके उनके ऊपर से पुल बनाया गया. लेकिन वहां जाने की इजाजत सिर्फ स्पोर्ट्स से जुड़े लोगों को ही थी. चूँकि पंजाब में आतंकवाद का दौर चल रहा था, सो इस पुल की सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ तैनात की गयी थी. एक दो बार कोशिश की पुल पार करके टावर पर जाने की, लेकिन सीआरपीएफ वालों ने भगा दिया.
जिस दिन चैम्पियनशिप ख़त्म हुयी, उस दिन चहल-पहल में मौका मिल गया और मैं टापू पर जा पहुँच. टावर के ऊपर तक जाने का मौका भी हाथ लग गया. वहां से सुखना झील समंदर सी लगी. टावर के ऊपर खड़े होकर पानी देखने से लगा जैसे जहाज में बैठे हों. बस उसी दिन से उस टावर के साथ मेरी यादें जुड़ गयी. हालांकि मैं उसपर दुबारा नहीं जा सका.
चैंपियनशिप तो एक हफ्ते में ख़त्म हो गयी, लेकिन टावर को नहीं हटाया गया, और वक़्त के साथ टावर सुखना के साथ जुड़ गया. एक पहचान के तौर पर. हज़ारों लोगों ने इसके फोटो लिए और सुखना पर आने की याद बनाया. अब नहीं है. अब यादें हैं.

Wednesday, October 7, 2009

मेरी आवाज़ ही पहचान है...गर याद रहे..!!



येही आवाज़ थी जो सत्तर के दशक के हम बच्चों को घरों से बाहर खींच लाती थी. गर्मी की छुटियों में जब धुप में बाहर न निकलने की सख्त हिदायत होती थी और मैं घर की खिड़की से लगा बैठा रहता था इस उम्मीद में कि पास में रहने वाले मनीष सिंगला, नीरज शर्मा, केनेथ डी'सूज़ा या लखन सिंह में से कोई खेलने के बुलाने आ ही जाये. तभी कहीं से यह आवाज आती थी और घर से बाहर निकलने का बहाना मिल ही जाता था. 'ला...लाला लाला लाला, मेरे अंगने में..' लावारिस फिल्म के इस गाने की पहली लाइन सुनते ही गली में रहने वाले सभी बच्चों को सिग्नल मिल जाता कि 'बाहर निकलने और खेलने की स्कीम बनाने का बहाना मिल गया.
ये आवाज़ थी बाईस्कोप की. दूर गली के मोड़ पर उसके भोंपू से गाने सुनते ही बीस पैसे की मांग शुरू हो जाती. असल में वह बाईस्कोप पर फोटो वाली फिल्म दिखाने के तो दस पैसे ही लेता था पर कभी-कभार किसी दोस्त के लिए 'एडजस्टमेंट' करने के चक्कर में 'दस्सी' ज्यादा रखनी पड़ती थी.
चंडीगढ़ जैसे बसते हुए शहर में उन दिनों मनोरजन के साधन बहुत नहीं थे. मनोरंजन के नाम पर लोग सुखना झील या रोज़ गार्डेन में घूमते थे या बहुत हुआ तो सेक्टर 17 के नीलम, जगत या 'केसी' सिनेमा में 'त्रिशूल', 'मुक्कदर का सिकंदर' या 'कुर्बानी' जैसी फिल्म देखने के लिए टिकेट मिल जाने की किस्मत आजमाने चले जाते.
रही बात बच्चों की तो, स्कूल के बाद का दिन तो शरारतों के लिए ही कम पड़ता था. हाँ, गर्मी की छुटियों में दिन काटना समस्या थी. उन दिनों टेलीविजन के प्रोग्राम के नाम पर भी शाम को चित्रहार और रविवार की सुबह 'स्टारट्रेक' ही आता था. दिन में घर से बाहर निकलकर कंचे खेले जा सकते थे, लेकिन उसके लिए इजाज़त लेने के लिए कहते ही एक 'स्टेनडर्ड' जवाब सुनना पड़ता था कि 'कोई और बच्चा नज़र आ रहा है बाहर?' ऐसे में बाईस्कोप वाले की आवाज़ बड़ी राहत देती थी की इस बहाने सब बच्चे बाहर आ जायेंगे और स्कीम बना लेंगे कि आधे घंटे बाद बारी-बारी से सभी के घर जाकर गुजारिश करनी है कि-'आंटी, इसे भेज दो खेलने..'
लिहाजा, बाईस्कोप से बचपन का जो नाता जुड़ा उसे मैं या उन दिनों मेरी उम्र के बच्चे ही महसूस कर सकते हैं. वक़्त के साथ शहर बदला, शहर का जियोग्राफिया, शहर के बाशिंदे और उनकी जरूरतें. शीशे के कमरे वाले दफ्तर हैं जहाँ से बाहर की आवाजें मुज तक नहीं पहुँचती. लैपटॉप पर काम करते हुए वर्ल्डस्पेस रेडियो पर में 'कुर्बानी' फिल्म का 'नसीब इंसान का चाहत से संवरता है..'सुनते हुए अचानक मैंने बाहर देखा तो यकीन नहीं हुआ, एक बाईस्कोप वाला सामने के पेड़ के नीचे खडा था, अब इसे कहाँ से मेरी याद आ गयी तीस साल बाद..!!!
मैं फ्लेशबैक में चला गया..गर्म दोपहरियों में वो सुनसान गलियों में दौड़ते आते बच्चों का एक 'सेपिया कलर' की कुछ सेकंड की फिल्म. भागते बच्चे कचनार के पेड़ के नीचे खड़े बाईस्कोप वाले के इर्द-गिर्द जमा हैं, कुछ अपनी बारी के इंतज़ार में. कुछ बारी पक्की करने के लिए हथेली में 'दस्सी' का सिक्का पहले ही बाईस्कोप वाले को देने के लिए उछलते हुए..और कुछ 'अडजस्टमेंट' करते हुए बारी-बारी से बाईस्कोप के भीतर झांकते हुए..!!
..कहीं यह बाईस्कोप वाला हमें तो नहीं ढूंढ रहा,?? मनीष, नीरज, केनेथ डी' सूज़ा...जल्दी आओ, वो आ गया है..!! मनीष न्यूयार्क में, नीरज गुडगाँव में कहीं, कैनेथ साउथ में शायद...!!! तभी मोबाईल पर घर से फोन- पापा, मैं बाहर खेलने जाऊं??' और मेरा जवाब-'बेटा, और कोई बच्चा नज़र आ रहा है बाहर?'''

Tuesday, October 6, 2009

वो जब याद आये, बहुत याद आये...





चंडीगढ़ प्रशासन को भी आज इस शहर का नक्शा बनाने वाले आर्कीटेक्ट ली कर्बुजिये बहुत याद आये. सेक्टर 19 में उनकी डिजाइन की चीजों को इकट्ठा करके बनाए गए ली कर्बुजिये सेंटर में उनकी ढेर सारी फोटो, उनके लिखे ख़त और बंजर ज़मीन पर एक शहर को बसाने का अक्स खींचते कार्बुजिये और उनकी टीम के लोगों के कुछ बेहद दुर्लभ फोटो.
आज यानी 6 अक्टूबर को उनका जन्मदिन होता है. इसके चलते आज कार्बुजिए सेंटर में रौनक थी. पत्रकार लोग आये हुए थे. इधर-उधर की फोटो खींचते हुए. किसी एक्सक्लूसिव स्टोरी की खोज में. किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि कार्बुजिये का जन्मदिन का महत्व इस शहर की पुरानी तस्वीरों को देखकर आज के शहर के हालातों के साथ जोड़कर देखने के बाद ही है. आज इस शहर की जो हालत हो गयी है, शर्तिया तौर पर कार्बुजिये ने ऐसा शहर बसाने का नक्शा नहीं खींचा था.
खैर, सेंटर में लगाई प्रदर्शनी में कुछ रोचक जानकारी मिली. कुछ दुर्लभ फोटो देखने को मिले जिन्हें आप भी देख सकते हैं इस पेज पर. इनसे पता चलता है कि कार्बुजिये कितने जिंदादिल और दूरदर्शी थे. शिवालिक की पहाडी की तलहटी में खड़े बंजर ज़मीन के टुकड़े पर पर एक खुशहाल शहर को देख पाना आम इंसान की सोच से परे की बात होती है.
कार्बुजिये को 1952 में चंडीगढ़ बसाने का जिम्मा मिला था और वे अपने चचेरे भाई पिएरे जेनरे के साथ यहाँ पहुंचे थे. एक और रोचक बात कार्बुजिये के बारे में जानने को मिली और वह यह कि वे 'स्विस' थे जन्म से, न कि 'फ्रेंच' जैसा कि उनके बारे में प्रचलित है. उनका जन्म स्विटजेरलैंड में 1887 में हुआ था और उनका असली नाम 'चार्ल्स एडवर्ड जेनरे' था. उन्होंने पहला काम उनका खुद का ऑफिस बनाने का किया था जहाँ आज यह कार्बुजिये सेंटर बना हुआ है. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु प्रोजेक्ट चंडीगढ़ को देखने 3 अप्रैल 1952 को चंडीगढ़ आये थे. उसके बाद उन्होंने सचिवालय बनाया और उसी दौरान उनके चचेरे भाई पिएरे जेनरे ने एसदी शर्मा और एम्एन शरण के साथ मिलकर अस्पताल, सेक्टर 22 की डिस्पेंसरी और सरकारी मकान बनाए.
एक और बात जो मुझे आज पता चली और वह भी सेंटर के इंचार्ज वीएन सिंह से. उन्होंने मुझे दो चित्थिआं दिखाई. एक वह जो नेहरु ने पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार परताप सिंह कैरों को लिखी थी जिसमे उन्होंने कहा था कि सुखना झील के पास कैंटनमेंट बनाने का प्रस्ताव रद्द कर दें क्योंकि यह कार्बुजिये को पसंद नहीं था. नेहरु ने लिखा कि ' कार्बुजिये का सुझाव कीमती है'. दूसरी चिट्ठी कार्बुजिये की लिखी है जो उन्होंने पंजाब के गवर्नर सीपीएन सिंह को 15 जुलाई 1954 को लिखी थी. इसमें कहा गवर्नर हाउस बनाने पर लगा उनका खर्च और वेतन जारी करवा देने को कहा गया है. जाहिर है, भारतीय लाल फीताशाही का मजा कर्बुजिये ने भी चखा था .
पता यह चला है कि कार्बुजिये कि लिखी इस चिट्ठी पर कारवाई हुयी थी और सरकारी खजाने से पैसा भी जारी हुआ लेकिन उसे कौन ले गया, इसके बारे में किसी के पास कोई जानकारी नहीं है.
महान आर्कीटेक्ट कार्बुजिये के जन्मदिन की बधाई.

Monday, June 29, 2009

छोटी सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं तुम...



...कहीं तो मिलोगे.....बिलकुल यही हुआ मेरे साथ. बीते रविवार शिमला के इंदिरा गाँधी मेडिकल कालेज के 'बी ब्लाक' से निकलते ही मेरी नज़र पड़ी इस पर, जिसकी फोटो आप देख रहे हैं, इस पन्ने पर. यह मेनहोल का ढक्कन है और मेनहोल पर ही लगा हुआ है. लेकिन सही जगह पर नहीं है. यह खिसक कर अपनी असली जगह से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आ गया गया है. असल में यह मेनहोल का यह ढक्कन चंडीगढ़ का है और चंडीगढ़ का नक्शा बनाने वाले फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कार्बुजिये ने शहर की गलियां डिजाइन तो की ही, शहर के मेनहोलों के ढक्कन भी डिजाइन किये. शहर में मेनहोलों पर अब भी यही ढक्कन नज़र आते हैं. यह ढक्कन शुद्ध लोहे का बना है और पूरे चालीस किलो का है. पुराने शहर में तो हैं ही, नए सेक्टरों में इनकी जगह सीमेंट के बने ढक्कन लगाए जा रहे हैं. जिसका कारण है कि अब शहर चलाने वाले अफसरों को मेनहोलों पर चालीस किलो के 'डिजाईनर' ढक्कन लगाने पैसे कि बर्बादी लगने लगी है. पुराने सेक्टरों में से चोरी हो गए लोहे के इन ढक्कनों की जगह अब सीमेंट के ढक्कन लगाए जा रहे हैं.
आप यह जानकार हैरान होंगे कि शहर की पहचान इन ढक्कनों की कीमत के बारे में दुनिया भर की खबर रखने वाले यहाँ के अफसरों को तब पता चला जब विदेश से खबर आयी कि शहर के मेनहोलों के ढक्कन चोरी हो कर विदेशों में आठ लाख रुपये में बिक रहे हैं. कला के पारखी और आर्किटेक्चर के दीवानों ने इन ढक्कनों को मुंह मांगी कीमतों पर खरीदा हैं. इसके बाद नींद से जागे अफसरों ने मेनहोलों से चोरी हुए दर्जनों ढक्कनों की चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराई. बताया जा रहा है कि आठ लाख के मेनहोल के ढक्कन बिकने की खबर छपने के बाद एक ही रात में पूरे मोहल्ले के ढक्कन चोरी होने के मामले भी हो गए.
इन ढक्कनों के बारे में यह जानना भी रोचक होगा कि इन ढक्कनों पर चंडीगढ़ का पूरा नक्शा बना हुआ है. ढक्कन
के उपरी हिस्से में बीच से दायीं तरफ जाती दो लाईनें असल में सुखना झील को सींचने वाली बरसाती नदी है और इन लाईनों के खत्म होने पर बना त्रिकोण सुखना झील है. नीचे चकोर खाने शहर के सेक्टर हैं और उसी 'पैटर्न' पर बने हैं जिसपर शहर के सेक्टर बसे हुए हैं, उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर यानी ढक्कन पर बने नक्शे के हिसाब से ऊपर से पहले दायें और दायें से फिर बाएँ. कहा तो यह भी जाता था कि इन ढक्कनों को इस तरह डिजाइन किया गया था कि शहर के सारे मेनहोलों के ढक्कन एक ही दिशा यानी सीधे ही फिट हो सकते थे. हालांकि मुझे ऐसा देखने को नहीं मिला.
खैर, कार्बुजिये की इस सोच को शहर की पहचान बनाने वाले इन ढक्कनों को अब चंडीगढ़ प्रशासन ने 'मोमेंटो' करार दे दिया है. सुखना झील पर सरकारी दूकान से ढक्कन से 'रेप्लिका' ख़रीदा जा सकता है. ली कार्बुजिये की याद में बनाया गया कर्बुजिये सेंटर से भी चंडीगढ़ की निशानी के तौर पर लोग खरीद रहे हैं और दूसरे शहरों में लेकर जा रहे हैं. लेकिन फिर भी मुझे यह बात समझ नहीं आ रही कि चंडीगढ़ के मेनहोल का ढक्कन शिमला के अस्पताल में कैसे लग गया??

Saturday, June 13, 2009

लहरों की तरह यादें, दिल से टकराती हैं...


पता नहीं क्यों बोटनी, यानी वनस्पति विज्ञान (जिसे 'इन्टेलीजेंसिया इग्नोरेंस' से ग्रसित मुझ जैसे विद्यार्थी घास-पत्ता विज्ञान कहते थे) बहुत ही आसान विषय लगती रही है. चंडीगढ़ के सरकारी कालेज में 10+1 के मेरे सहपाठी जब बंद कमरे में फूलों के पत्ते तोड़-तोड़कर उनके नाम याद करने की जद्दो-जहद में लगे होते थे, मैं खिड़की से नज़र आने वाले प्रिंसीपल के दफ्तर के सामने के घास के मैदान में लम्बी हो गयी घास के साथ झूमते गेंदे के फूल देखता तो मुझे बाहर अक्टूबर महीने की नर्म होती धूप बाहर आने का इशारा करती. और जिस दिन मुझे पता चला कि कालेज में क्लास से उड़नछू हो जाने पार कोई ख़ास पाबंदी नहीं होती और बाद में मिन्नतें करके 'लेक्चर अटेंडेंस' पूरी करवाई जा सकती है तो मैंने क्लास से बाहर जाकर ही बोटनी पड़ने का फैसला कर लिया. क्लास बंक करने के पहले दिन मैं अपनी साईकिल उठाकर सीधा झील पर जा पहुँच.
सुखना झील. चंडीगढ़ की निशानी और मेरे भीतर कवि को जनम देने का आरोप इसी झील पर जाता है. कितने ही दिन मैंने कालेज से बाहर इस झील के पिछले किनारे पर सर्दियों की धुप में बैठे-बैठे, या झील के पीछे दूर तक फैले जंगल में पेड़ों का नाम रखते हुए और सन्नाटे में सूखे पड़े पत्तों पर चलने की आवाज़ सुनते हुए गुजार दिए, इसका हिसाब मेरे पास नहीं था, कालेज में बोटनी पढाने वाली लेक्चरर के पास था. दोस्तों का कहा भी सच हो गया कि मिन्नतें करने से लेक्चर अटेंडेंस पूरी हो जाती है. दो साल में सरकारी कालेज से सम्बन्ध छूट गया, लेकिन सुखना झील के साथ जुड़ा सम्बन्ध आज भी कायम है. झील के बीचों-बीच बने 'वाच टावर' के पास से पानी में उतरने वाली सीढियों पर साईकिल फेंक कर पानी के पास वाली आखिरी सीढ़ी पर 'बैठे रहें तस्व्वुरे जाना किये हुए' की तर्ज़ पर लहरें गिनते रहने के दिनों की यादें आज भी साथ हैं, लेकिन अफ़सोस हैं कि सुखना अब वैसी नहीं रही.
सुखना अब सूख रही है. पानी का स्तर कम होता जा रहा है. झील में पानी लाने वाली बरसाती नदी ' सुखना चो' के साथ आती जा रही मिट्टी ने झील को उथला कर दिया है. हालांकि प्रशासन सरकारी तौर पर की जाने वाली औपचारिकता पूरी करता है, लेकिन कुछ हो नहीं पा रहा. हर साल की तरह इस बार भी लोग झील के सूख गए हिस्से से मिट्टी निकालने के अभियान 'श्रमदान' करने आये तो लेकिन गिनती भर के. सरकारी तौर पर एक आध मशीन झील के पिछले हिस्से में से सूखी गाद निकालने के काम में लगी हुई है, लेकिन लगता है, सुखना के साथ इस शहर के लोगों का मोह ख़त्म हो गया है. नयी आबादी, 'जेन नेक्स्ट' जवान हो गयी है, जिसके पास अभी वर्तमान है, यादें नहीं हैं.
मुझे याद आता है कैसे 1989 में सुखना झील को सूखने से बचाने के लिए 'श्रमदान अभियान' चलाया गया था. चंडीगढ़ प्रशासन के सलाहकार आईऐएस अधिकारी अशोक प्रधान ने इसे शुरू किया था. अप्रेल कि 18 तारीख को शुरू हुए अभियान में मिट्टी खोदकर टोकरे में भर कर बाहर फेंकने वालों में अशोक प्रधान सबसे आगे हुआ करते थे. और सरकारी अफसरों की तरह एक दिन नहीं, हर रोज, लगभग एक महीने तक. उनके चक्कर में प्रशासन के बाकी अफसरों को भी आना पड़ता था, चाहे मन मारकर ही. और जब लोगों ने देखा कि अफसरों से अनोपचारिक तरीके से मिलने का यह तरीका अच्छा है, तो वे भी आने लगे. लोगों का उत्साह देखकर प्रशासन से 'श्रमदान' को सालाना अभियान बना दिया गया. इस अभियान के लिए लोगों के जनून का आलम यह था कि चंडीगढ़ के हर सेक्टर से श्रमदान करने जाने वालों को सुबह साढ़े पांच बजे झील तक मुफ्त बस सेवा मिलती थी. बसों के आगे बोर्ड लगा हुआ हुआ होता था-'श्रमदान स्पेशल'. ऐसी ही एक बस के नीचे कुचले जाने से एक स्कूली बच्चे की मौत हो गयी थी जिसकी याद में एक ट्राफी शुरू कि गयी. और तो और ब्रिटिश एयरवेज़ ने बेहतरीन श्रमदानी के लिए मुफ्त हवाई यात्रा तक का इनाम रखा.
बाद में अफसर बदले, नए अफसरों को सुबह पांच बजे ही गर्मी लगने लगती है और एसी से बाहर नहीं निकल पाते. फिर ऐसी जगहों पर 'आम आदमी' से हाथ मिलाना और बात करना पड़ सकता है, सो इस अभियान में रूचि भी कम होने लगी. धीरे धीरे बिलकुल ही खतम जैसी हो गयी है.
असल में पिछले कुछ सालों के दौरान झील में पानी का स्तर पांच मीटर से घटकर सिर्फ दो मीटर रह गया है और इसका कुल क्षेत्रफल भी 230 हेक्टेयर से कम होकर 154 हेक्टेयर रह गया है. झील को सींचने वाली नदी में पौने दो सौ से अधिक टैंक बनाने के बावजूद झील में बहकर आने वाली गाद को रोकने के सरे प्रयास नाकाम हो गए हैं. सुना था कि प्रशासन ने एक बार 73 करोड़ रुपये की एक योजना बनायी थी झील को सूखने से बचाने के लिए, लेकिन अफसरशाही ने ही फाईलें रोक ली. ड्रेजिंग कारपोरशन ऑफ़ इंडिया से भी कहा, लेकिन हुआ कुछ नहीं.
अब हालत ऐसे हैं कि झील में पानी इतना कम हो गया है कि किश्तियाँ पानी में फंस जाती हैं, पानी कम हो गया है, लहरें नहीं उठती. यादें भी सूखती जा रही है. मेरी भी और देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु की भी, जिन्होंने इस शहर का नक्शा बनाने वाले फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कार्बुजिये को ख़ास तौर से चिट्ठी लिखकर शहर में एक झील बनाने की गुजारिश की थी. और इस झील के बारे में यह जान लेना भी रोचक होगा कि यह देश कि एकमात्र मानव निर्मित झील है जिसे 'नॅशनल वेटलैंड' का दर्जा हासिल है और हर साल अक्टूबर से मार्च तक सैकडों प्रवासी परिंदे यहाँ आते हैं. कहीं ऐसा न हो कि इन परिंदों का आना भी यादों में ही रह जाए.

Thursday, April 23, 2009

न उड़ा यूं ठोकरों से मेरी ख़ाक-ऐ-कब्र....







ख़ुशी इस बात से हुई कि पिछले दिनों चंडीगढ़ प्रशासन ने सेक्टर 19 में बनी उस पुरानी बिल्डिंग का हुलिया बदलकर उसे चंडीगढ़ का नक्शा बनाने वाले आर्किटेक्ट ली कार्बुजिए के नाम पर रख दिया और उस महान नक्शा नवीस की डिजाइन की हुई चीज़ें सजाकर रख दी हैं। इसी बिल्डिंग में कार्बुजिए ने मेज-कुर्सी लगाकर चंडीगढ़ के नक्शे की पहली आड़ी-तिरछी लाइनें खिंची थी।
ऐसी लाईनें खींचने से भी पहले कार्बुजिए ने इस बिल्डिंग का नक्शा बनाया और शिवालिक की पहाड़ियों तले बसने वाले इस शहर की पहली बिल्डिंग बनायी। एक मंजिला इस भवन में कई साल कई तरह के सरकारी दफ्तर चलते रहने के बाद इसे अब जाकर कार्बुजिए के नाम किया गया है. इसमें वह सब सामान जमा किया गया है जो कार्बुजिए ने डिजाइन किया. इसमें कुर्सियां-मेज से लेकर शहर के हर मेनहोल पर रखे ढक्कन तक को रखा गया है.
शुक्र है, प्रशासन को शहर के साठ साल के इतिहास को सँभालने की सुध आ गयी है। वह भी शायद तब जब अखबारों में ऐसी खबरें छपी कि चंडीगढ़ के किसी गट्टर से चोरी हुआ मेनहोल का ढक्कन लन्दन में आठ लाख का नीलाम हुआ। तीस किलोग्राम शुद्ध लोहे का बने ढक्कन कि चोरी कि रिपोर्ट तक प्रशासन ने कभी दर्ज नहीं कराई थी। वैसे कला के पारखी कबाडियों के जरिये शहर के आधे से ज्यादा मेनहोल के ढक्कन ठिकाने लगा चुके हैं। आठ लाख रूपये में मेनहोल का ढक्कन नीलाम होने के खबर छपते ही प्रशासन ने ली कार्बुजिए सेंटर का उदघाटन कर दिया। खैर इस से इस बिल्डिंग का भला हो गया जो कितने सालों से खस्ता हाल पड़ी थी और गिरने और कगार पर आन पहुंची थी।
शहर बसने और कुछ निशानियों में से एक इस बिल्डिंग के बारे में मैंने कुछ लोगों से बात और पाया कि जंगलों के बीच शहर की पहली बिल्डिंग के लिए उस जगह का चुनाव क्यों किया गया जो आज का सेक्टर 19 है।
असल में चंडीगढ़ बसने से पहले यहाँ एक छोटा सा पड़ाव था जहाँ पंजाब के रोपड़ से सड़क उन दिनों के मेन शहर कालका जाती थी। इस सड़क पर तीन बड़े पड़ाव थे। पहला आज के सेक्टर 22 में सिमटकर रह गयी छोटी सी सब्जी मार्केट जो बजवाडा के नाम से जानी जाती थी। आज भी पुराने लोग इस पूरे इलाके को ही बजवाडा के नाम से जानते हैं।
दूसरा पड़ाव सेक्टर 19 में नगला नाम का गाँव था। जिसकी हद आज के सेक्टर 17 में स्थित बस अड्डे तक फैली हुई थी। बस अड्डे में लगा बड़ा सा पीपल का पेड़ उस गाँव के बड़े कुँए के पास लगा था। कुँआ तो नहीं रहा, अलबता पीपल अभी है, पता नहीं कब तक रहेगा। नगला गावं सेक्टर 19 में एक कनाल का प्लाट भर रह गया है। जहाँ आज भी बाहर लगा बोर्ड देखा जा सकता है जिसपर लिखा हुआ है "प्राचीन नगला"। अब यहाँ एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है। (गेट वाला फोटो देखें)
तीसरा बड़ा पड़ाव मनीमाजरा इलाके में पीपलीवाला अड्डा था जो आज के पीपलीवाला टाऊन के घरों के नीचे कहीं दफन है। अब बात करते हैं, सेक्टर 19 में ही ली कार्बुजिए की पहली बिल्डिंग बनाने के ख्याल की बात। असल में शाम को जो बस रोपड़ से चलकर कालका जाती थी वह पहले बजवाडा, फिर नगला और फिर मनीमाजरा रूकती थी। चंडीगढ़ प्रोजेक्ट में लगी टीम दिनभर यहाँ जंगलों में काम करती थी और शाम को कालका चली जाती थी जो उन दिनों शिमला से पहले का सबसे बड़ा बाज़ार भी था। चंडीगढ़ बसाने वाली टीम से जुड़े कुछ लोग बताते हैं की किस तरह दिनभर के काम के बाद लोग बजवाडा के बाज़ार से जरूरत का सामन, खासकर फल-सब्जियां खरीदते थे और रोपड़ से कालका जाने वाली बस पकड़कर चले जाते थे। सो, यही जगह सबसे सही थी।इसी बिल्डिंग में शहर का पहला अस्पताल भी चला. जंगल में काम करने वालों को जंगली कुत्तों और बंदरों के काटने के कारण रेबीज़ हो जाने का खतरा रहता था. ऐसे लोगों के लिए कसौली में बसे सेंट्रल सीरम इंस्टीट्युट-सीआरआई- से वेक्सिन आती थी. बताते हैं कि शाम को कालका जाने वाली बस के साथ ही अगले दिन आने वाली वेक्सिन का आर्डर भी भेज दिया जाता था. और अगले दिन उतनी ही वेक्सिन आ जाती थी, क्योंकि जंगल में फ्रिज तो थे नहीं वेक्सिन रखने के लिए. सो, कसौली से आने वाली पहली बस से ही वेक्सिन आ जाती थी और लोग उससे पहले ही खड़े होते थे लाइन बनाकर पेट में सुए लगवाने के लिए. मैंने भी बचपन में पड़ोसियों के कुत्ते की मेहरबानी से इसी बिल्डिंग में चलने वाले एंटी-रेबीज़ क्लीनिक में सुए लगवाते हुए चीखें मारी हुई हैं. सो, यह भी एक कारण था सेक्टर 19 में प्रोजेक्ट की पहली बिल्डिंग और ऑफिस बनाने का. बाद में इस बिल्डिंग में जंगलात महकमे का दफ्तर भी बना जो आज भी है।
इस बिल्डिंग में आप शहर के बनने के दिनों का इतिहास देख सकते हैं. प्रशासन ने शहर के "हेरिटेज" को संभालने की सरकारी कोशिश की है. सरकारी इसलिए कि पंजाब युनिवेर्सिटी और कुछ और सरकारी महकमों के कबाड़ में पड़ी पुरानी कुर्सियां तो उठा लाये, लेकिन शहर कि असल नींव को बर्बाद कर दिया।
इस बिल्डिंग और इस सामान से भी पुरानी और "हेरिटेज" तो वह सड़क है जिसकी निशानियाँ आज भी कुछ सेक्टरों में बिखरी पड़ी है. उन्हें संभालना तो दूर, कई जगहों पर तो उसे उखाड़ दिया गया है. इस बिल्डिंग को सहेजने के साथ-साथ "ओल्ड रोपड़ रोड" के हिस्सों को भी धरोहर बना लेते तो शहर उसे निशानियाँ बच जाती. वैसे मनीमाजरा के लोग अब भी एक हिस्से को ओल्ड रोपड़ रोड कहते हैं और घर का पता भी मकान नम्बर फलां, ओल्ड रोपड़ रोड बताते हैं।
नहीं जानने वालों के लिए बता दूं कि बजवाडा से अरोमा होटल की और जाते हुए जो सौ मीटर का पत्थरीला रास्ता स्कूल की दीवार के साथ साथ गुजरता है, वह ओल्ड रोपर रोड की ही बची हुई ख़ाक है. यह हिस्सा आगे जाकर सेक्टर 21 के एक पार्क के बीचोंबीच गुजरता है. उसके ठीक ऊपर अब घर बन गए है. (फोटो में सड़क के ठीक ऊपर घर बना दीखता है।इस घर के पीछे भी सड़क का हिस्सा है ) आगे जाकर यह सड़क फिर कुछ नज़र आती है और निरंकारी भवन के पीछे बने पार्क में दिखती है. दुःख मुझे इस बात का हुआ कि सेक्टर 21 बी में ही एक पार्क के बीच से गुजरती इस सड़क की निशानियों को पार्क में घास लगाने के लिए उखाड़ फेंका गया।
काश, इस शहर के बसने की इन बजवाडा, मनीमाजरा और नगला जैसी निशानियों को भी ठोकरों से उड़ाने से बचा लिया होता. मुझे लगता है इस सड़क के कई हिस्से यही कह रहे हैं- "न उड़ा यूं ठोकरों से मेरी ख़ाक-ऐ-कब्र जालिम, यही ले दे रह गयी है मेरे प्यार की निशानी".

Thursday, March 26, 2009

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता....















इन दिनों चंडीगढ़ में रंगों की बहार है. हर तरफ रंग भरी फिजाएं हैं. पेड़ों से रंग बरस रहे है। दुनिया का तो मुझे नहीं पता, लेकिन इतना जरूर है कि देश में दूसरा ऐसा कोई शहर नहीं है जहाँ गर्मी की शुरुआत इतनी रंगीन और हसीं होती हो। ऐसा लगता है जैसे बहुत सारे गुलमोहर एक साथ खिलखिलाकर हंस पड़े हों।
दरअसल, चंडीगढ़ में मार्च का महीना अपने आप में हसीं होता है। चंडीगढ़ में रहने वालों को तो नहीं पता, लेकिन बाहर से आने वाले देख सकते हैं कि शहर की सड़कें किस तरह रंगीन लबादे पहने खड़े पेड़ों के रंग में रंगी है। मार्च के महीने में शहर में दो तरह के बदलाव आते हैं। पहला, सडकों के किनारों पर लगे पेड़ों के इतने पत्ते झरते हैं कि सड़कें भर जाती हैं। इन पत्तों को उठाना एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
खैर, दूसरा बदलाव रोमानी होता है। पेड़ों के नए पत्ते निकलते हैं और एक ही महीने में कई रंग बदलते हैं। हल्के रंग के पत्ते निकलते हैं और कच्ची धूप के साथ रंग बदलते रहते हैं। हर रोज़ सडकों का रंग बदला हुआ मिलता है। रोज़ एक ही सड़क से गुजरकर जाने वाले भी हैरान होते हैं कि कल यहाँ किसी और रंग का पेड़ था, आज यह कहाँ से आ गया?
चंडीगढ़ में तीन किस्मों के पेड़ बहुत हैं। अमलतास, कचनार और गुलमोहर। गर्मियां आते ही यह तीनो चटक उठते हैं और महक देते हैं। सुखना झील के किनारे-किनारे करीब दो किलोमीटर लम्बे घास के मैदान के साथ-साथ चलती पगडण्डी पर लगे कचनार मार्च शुरू होते ही गुलाबी होने लगते हैं और अप्रैल आते-आते पत्तों की हरियाली छोड़कर पूरी तरह गुलाबी हो जाते हैं। इनकी छाया खत्म हो जाती है और सिर्फ रंग रह जाता है। हाँ, और एक रंग रह जाता है उसके तले। दुनिया की भाग-दौड़ से दूर अपनी ही दुनिया के रंग में खोये कई प्रेमी जोड़े आपको मिल जायेंगे इन कचनारों के नीचे बैठे। हालांकि कचनारों की छाया कम ही होती है, लेकिन प्यार में धूप का रंग भी गुलाबी लगता है।
शहर में अमलतास के पेड़ भी बहुतायत में हैं। शहर की पश्चिम से पूर्व की और जाने वाली सड़कों में से एक जन मार्ग के कई किलोमीटर लम्बे रास्ते पर अमलतास लगा है। गर्मी पड़ते ही अमलतास के पीले फूल ऐसे खिल उठते हैं कि रास्ता देखते ही बनता है। एक बात और; अमलतास के पेड़ों पर झींगुर रहते हैं जो सुबह होते ही बोलना शुरू करते हैं और शहर कि सुनसान दोपहरियों को रोमांटिक बना देते हैं। पता नहीं क्यूँ मुझे लगता है कि उदय प्रकाश ने उनकी कहानी 'पीली छतरी वाली लड़की' किसी अमलतास के पेड़ के नीचे से गुजरते हुए ही सोची होगी।
अमलतास से ही मुझे करीब तीन दशक पुरानी बात याद आ गयी। बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ता था। तीसरी क्लास में। चंडीगढ़ के सेक्टर 21 ऐ में रहा करता था। मेरे घर के आगे की सड़क पर कचनार के पेड़ लगे थे और मैं कचनार की कलियों के गुलाबी रंग से अपना नाम दीवार पर लिखा करता था। अप्रैल के दिन थे। स्कूल की छुट्टियाँ थी। चंडीगढ़ में मेरा पहला क्लासमेट और दोस्त त्रिलोक ठकुराल था। वह सेक्टर 21 डी रहता था। उसके घर की कतार के आगे अमलतास के पेड़ लगे थे एक लाइन में। दूर तक। एक शाम मैं उसके घर चला गया और रात को वहीँ सो गया। हम दोनों ने फैसला किया कि हम घर के आगे वाले आँगन में गेट के पास बिस्तर लगा कर अमलतास के पेड़ के नीचे सोयेंगे। और अगली सुबह नींद खुलने पर मैंने पाया कि मैं जिस बिस्तर पर सो रहा था उसके ऊपर, मेरे चारों तरफ, पूरे आंगन में अमलतास के पीले रंग के फूल एक गोलाई में बिखरे थे। मैं बहुत देर तक यह सोच कर नहीं उठा कि मेरे उठने पर मेरे ऊपर और बिस्तर पर बिखरे पड़े फूल गिर जायेंगे। वह मेरे जीवन की सबसे सुंदर सुबह थी। अगर मुझे कोई एक अहसास फिर से महसूस करने का वरदान दे तो मैं वही सुबह मांगूंगा।
खैर, एक बात और बताना चाहूँगा चंडीगढ़ के बारे में। और वह यह कि चंडीगढ़ में इन तीन खूबसूरत रंगों के पेड़ों के अलावा तीन और अच्छे पेड़ों के झुरमुट हुआ करते थे जिनमें से एक शहर की भीड़ के तले कुचला गया। सेक्टर 29 में ट्रिब्यून चौक से लेकर सेक्टर 26 में ट्रांसपोर्ट लाईटों तक आम के हजारों पेड़ हैं। सरकारी हैं। इसे 'मैंगो ग्रूव' के नाम से जाना जाता है। इन्हें लगाने का कारण तो यह था कि पेड़ों के दक्षिण की तरफ के इंडस्ट्रियल एरिया की गर्मी और धुंआ इधर रिहायशी इलाके में न आये। दूसरा है, सेक्टर 22 ऐ में एक गोल सड़क के साथ साथ लगे नीम के बहुत से पेड़। बरसात के दिनों में निम्बोरी की महक दूर से ही महसूस की जा सकती है, बशर्ते, बचपन में आपने पककर मीठी हो गयी निम्बोरी खाकर देखी हों। एक और था ऐसा झुरमुट जो सेक्टर 20 से पूर्व दिशा में जाने वाली सड़क पर गोल्फ कोर्स तक लगाया गया था। वह था 'इमली अवेन्यु'। करीब पांच किलोमीटर लम्बे रास्ते पर इमली के सैकडों पेड़ थे। यह पेड़ उन दिनों लगाये गए थे जब शहर बस रहा था। और मकानों की कतारों की भूल-भुलैया में फंसने से पहले पहाड़ी हवा इन्हीं इमली के छोटे-छोटे पौधों के साथ लूका-मिची खेलती फिरती थी। पता नहीं बाद में इन्हें किसकी नज़र लगी। दीमक ने सैकडों पेड़ों को बर्बाद कर डाला। अब भी कुछेक पेड़ बचे हैं शहर के आबाद होने की यादें लिए। शुक्र है कचनार, अमलतास और गुलमोहर अभी बचे हैं और खिलखिला रहे हैं। शुक्र है इस हवा का भी जो गुलमोहर को हंसा रही है। मुझे किशोर कुमार का गाया एक गीत याद आ गया। 'गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता, मौसम-ऐ-गुल को हँसाना ही हमारा काम होता। '