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Saturday, July 23, 2011

बीती हुई ये घड़ियाँ फिर से ना गुजर जाएँ....




मेरे सात साल के बेटे ने आकर कहा-पापा आपके पास चालीस रूपये हैं? मैंने कहा-हाँ, तो उसका जवाब आया कि -फिर टाटा स्काई पर 'एक्टिव गेम्स' का पैक क्यों नहीं लगवा देते? मैं उसकी इस बात को पहले भी कई बार अनसुना कर चुका हूँ, क्योंकि डोरेमोन, मिस्टर बीन, बेन-टेन और ओगी एंड द कोक्रेच देखने में ही हर रोज़ तीन घंटे तक टीवी के आगे बैठे रहने से उसकी आई-साईट पर असर पड़ने के डर से मैं अन्दर ही अन्दर डरा रहता हूँ. और ये टाटा स्काई वाले भी बच्चों के लिए ही कम से कम पांच चैनल चला रहे हैं. पोगो, निक्क, डिस्नी, कार्टून नेटवर्क और पता नहीं कौन से.
मुझे याद आया उसकी उम्र में मेरे जैसे बच्चों के लिए कोई भी प्रोग्राम नहीं था सिवाय एक के. शनिवार की शाम पांच बजे जालंधर दूरदर्शन से एक कार्टून शो आता था 'जिम्मी एंड द मैजिक टॉर्च'. पर उसे देखने में यह दिक्कत थी कि जालंधर दूरदर्शन के सिग्नल मनमर्जी के मालिक थे. सिग्नल आया तो आया नहीं आया तो नहीं. शहर में गिनती के टेलीविज़न थे. 1982 में हुए एशिआड खेलों के बाद ही टेलिविज़न का दौर आया था. तब हमारे घर में टेलिविज़न नहीं था. मनीष के घर पर था, लेकिन उसे टेलिविज़न देखने का कोई ख़ास शौक़ नहीं था. टेलिविज़न देखने की बजाय वह फैंटम की कोमिक्स की अदला-बदली करने में लगा रहता. एक दो बार उसके घर में जिम्मी वाला शो देखा भी, पर उसकी गैर-मौजूदगी में अजनबी से बन कर बैठना पड़ा.
उन दिनों टेलिविज़न वालों का अपना अलग रुतबा था. उनकी दोस्ती थी क्योंकि सिग्नल नहीं आने के सब के दुख तो सांझे थे ही, टेलिविज़न के एंटेना के तार भी. उन दिनों टेलिविज़न का एंटेना करीब बीस फुट ऊँचा लगता था, यानी एंटेना अपने घर की छत पर और तारें पड़ोसियों की छतों के जंगलों से बंधी होती थी. इसलिए अच्छे पडोसी बने रहना भी मजबूरी थी. सिग्नल नहीं आने का 'कोमन डिस्कशन' था और वीएचऍफ़ से यूएचऍफ़ बूस्टर लगवाने की सलाहों का दौर. फिर टेलिविज़न खरीदने की योजना बना रहे पडोसी को 'क्राउन', 'टेक्सला', या लकड़ी के दरवाजे वाला 'ईसी टीवी' की खूबियाँ और कमियां बताने का दौर और यह भी कि टीवी खरीदने जाओ तो दुकानदार से पहले ही खोल लेना की आगे लगने वाली रंगीन स्क्रीन साथ में फ्री लेंगे.
एक और नज़ारा था जो पहले बुधवार की शाम, फिर, वीरवर की शाम और फिर रविवार की सुबह देखने को मिलता था और वह था एंटेना की दिशा बदलने का कार्यक्रम. असल में उन्ही दिनों कसौली में एक लो फ्रिक्वेंसी का ट्रांसमीटर शुरू हो गया था जो दिल्ली दूरदर्शन के प्रोग्राम रिले करता था. बुधवार की शाम जालंधर दूरदर्शन से चित्रहार आता था तो वीरवार को दिल्ली से फिल्म. उसके बाद रात को 'बुनियाद' और रविवार की सुबह 'स्टार-ट्रेक' जैसे प्रोग्राम. कुल मिलाकर हर टेलिविज़न वाले घर में रोज़ शाम को लगभग एक जैसा सीन होता था, एक मेम्बर छत पर चढ़कर एंटेना की दिशा जालंधर से बदलकर कसौली की और करता और दूसरा नीचे टेलिविज़न के आगे खड़ा होकर चिल्ला-चिल्लाकर "आ गया, नहीं, हाँ, हाँ आ गया, थोडा और घुमा" जैसे सन्देश प्रसारित कर रहा होता. जब तक हमारे घर में टेलिविज़न नहीं आया था, तब तक मैंने भी एक-आध बार हमारे पडोसी मोंटी गिल और पहली मंजिल पर रहने वाली मनीषा गुप्ता के बैंक मैनेजर पापा की मदद की थी. मनीषा को भी चित्रहार देखने का काफी शौक़ था और उसके चलते उसने कई बार मेरे सामने ही उसके पापा से डांट भी खाई, लेकिन सुबह स्कूल जाते समय उसने जबरदस्ती टीवी बंद कर दिए जाने के लिए सॉरी भी बोला. मैंने कहा-कोई बात नहीं. मेरे घर में टीवी आने के बाद मनीषा से हफ्ते में दो बार सॉरी सुनने के मौके भी जाते रहे.
ब्लैक एंड व्हाईट टीवी का ज़माना कब बीता, पता नहीं चला, मेरे घर में कब ब्लैक एंड व्हाईट 'क्राउन' से कलर टीवी 'अकाई' और फिर 'एलजी' आ गया, पता ही नहीं चला. पिछले दिनों सेक्टर 22 में डिस्पेंसरी के सामने उस कोने वाले घर की छत पर अभी तक भी बीस फुट के एंटेना के साथ डिश भी लगी देखी तो ध्यान दिया कि वहां से कसौली की पहाड़ियाँ साफ़ दिखती हैं. हाँ डिश की दिशा जरुर दिल्ली की और हो गयी है.
घर आकर बताया कि शहर में अभी तक भी ब्लैक एंड व्हाईट टीवी के एंटेना लगे हुए हैं तो बेटे ने पूछा-पापा, आपके ज़माने में टीवी लकड़ी के बने होते थे? मैंने कहा-हाँ. अगला सवाल-तो क्या रिमोट भी लकड़ी के थे?

Saturday, May 22, 2010

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा...!!


इतने साल तक चड़ीगढ़ में रहने के दौरान शायद शहर की सीमा में ही बसे इस गाँव में जाने की जरूरत शायद एक या दो बार ही पड़ी. इसलिए इस इस गाँव के नाम और इसके इतिहास के बारे में जानने के बारे में भी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं हुई. लेकिन हाल ही में मुझे यह पता लगा कि इस मजाकिया से लगने वाले नाम का सम्बन्ध महाभारत काल से है.
डडू माजरा..यह नाम अपने आप में सिर्फ इतना आकर्षण रखता है है कि पंजाब के बहुत से गाँवों के नामों की तरह इसका नाम भी जानवरों पर है. पंजाबी में 'डडू' मेंढक को कहते हैं. अब शायद आपको भी यह नाम मजाकिया लग रहा हो.
यहाँ बता देता हूँ कि पंजाब के मालवा इलाके में दर्जनों गाँवों के नाम जानवरों के नामों पर हैं और काफी मजाकिया लगते हैं. हाल ही में कुछ गाँवों की पंचायतों ने तो सरकार को लिखकर भी दिया है कि उनके गाँव का नाम बदल दिया जाए क्योंकि उन्हें उनके गाँव का नाम बताते हुए शर्म आती है. सिरसा के जिस गाँव में मेरी बुआ रहती है, उसके पास ही एक गाँव है 'कुत्ते वढ' यानि कुत्तों को काटने वाला. कोई तीन दशक पहले बंजर जमीन वाले इस गाँव में मेरे एक भाई ने कुछ जमीन ली थी, जिसे उसने अपनी मेहनत से वहां फसलें लहलहा दी और फिर उसी गाँव में बसने का फैसला कर लिया. उसने जब अपना विजिटिंग कार्ड छपवाने का इरादा बताया तो मेरी बुआ के बेटे ने सुझाव दिया कि वह अपने नाम के साथ गाँव का नाम भी लिखवा ले, जैसे पंजाब में रिवाज है. तो उसके नाम का विजिटिंग कार्ड 'केवल सिंह कुत्तेवढ' के तौर पर बना. बाद में जब उसके कुछ दोस्तों ने उसे 'केवल' या 'केले' की बजाय ' हाँ बई, कुत्तेवढ, क्या हाल है?' कहना शुरू कर दिया तो उसने विजिटिंग कार्ड में 'भूल सुधार' भी किया.
ऐसे ही कई गाँव है जिनके नाम अब भी जानवरों के नाम पर हैं. बठिंडा के पास एक गाँव 'गिदडाँ वाली' है जहाँ के लोगों ने सरकार से मांग की है कि गाँव का नाम बदल कर इसके असली नाम शेरपुरा पर रखा जाये, जिसे सालों पहले एक धर्मस्थान का पानी चोरी करने के कारण एक साधू ने श्राप देकर शेरपुरा से गिदडाँवाली कर दिया था.
खैर, डडू माजरा का नाम बदलें की तो कोई मांग नहीं आये है, लेकिन यह मांग जरूर उठी है कि यहाँ बने महाभारत कालीन एक मंदिर का सुधार किया जाए. मैंने जब इसके बारे में सुना तो पता लगाया और पाया कि 'डडू' उस भील बालक को प्यार से घर में पुकारे जाने का नाम है जिसे महाभारत ग्रन्थ में 'एकलव्य' कहा गया है. यहाँ बना मंदिर वही जगह है जहाँ एकलव्य ने पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की मिटटी की मूर्ति बनाकर, उसे ही गुरु धार कर तीरंदाजी सीखनी शुरू की थी. यह जगह गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम 'गुरु गाँव' (आज के गुडगाँव) से एक सौ कोस की दूरी पर था. यहाँ एक कुआं भी है, शायद वही है जिसका जिक्र महाभारत में एकलव्य के घर के बारे में मिलता है. आज भी यह डडू माजरा की गुडगाँव से दूरी इतनी ही है, करीब तीन सौ किलोमीटर..!!

Sunday, April 18, 2010

दिल का क्या रंग करूं, खून-ए-जिगर होने तक..!!


अब जब शहर यूनेस्को की हेरिटेज लिस्ट में आने को तैयार है तो शहर के हुक्मरानों को एक नया आईडिया आ गया है इस शहर की शक्ल-ओ-सूरत खराब करने का. मुझे नहीं लगता कि यह आईडिया किसी अफसर के दिमाग की उपज है क्योंकि या तो ये एयर कंडिशनर लगे दफ्तरों से निकलते नहीं, निकलते हैं तो सरकारी कारों के काले शीशों पर भी परदे लगाकर. और जहाँ तक शहर के हुक्मरानों के सेक्टर 17 आने का सवाल है, मैंने पिछले लम्बे समय से इतने बड़े किसी अफसर को सेक्टर 17 में नहीं देखा जो शहर के बारे में बड़ा फैसला लेने की औकात रखता हो.
सेक्टर 17 के बारे में वही लोग फिक्रमंद होसकते हैंजो दिनमें कम से कम एक बार या हफ्ते में दो बार यहाँ सिर्फ घूमने या किसी पेड़ के नीचे बैठकर चाय पीने के लिए आते हों. मैं दूसरी किस्म का हूँ, मतलब जो यहाँ किसी पेड़ के नीचे बैठकर चाय पीते हुए इस शहर का नक्शा बनाने वाले फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कर्बुजिये की समझ और पसंद को 'डिकोड' करने की फिराक में है. ली कर्बुजिये की इस समझ और पसंद को इस सरकारी अफसरों की तरह मैं भी अब तक डीकोड नहीं कर पाया हूँ कि उसने शहर के दिल कहे जाने वाले सेक्टर 'सतारां' की इन इमारतों पर पेंट क्यों नहीं किया था, और सिर्फ सीमेंट के रंग की इन इमारतों में वोह कौन सी खूबसूरती है कि इसको पेंट करने के सरकारी इररादों के खिलाफ मेरे जैसे कई लोग उठ खड़े हुए हैं.
सुना है, किसी ठेकेदारनुमा छूते अफसर ने बड़े साह्बोंको यह आईडिया दे दिया है कि सेक्टर 17 की इमारतों को पेंट कर देते हैं. जाहिर है, किसी ठेकेदार को काम मिलेगा तो सबको फायदा होगा. जैसा कि चंडीगढ़ में डेपुटेशन पर आने वाली अफसरशाही की समस्या है, यह लोग फाईलों से आगे देखते ही नहीं. चंडीगढ़ में आने वाले यह अफसर यह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि चंडीगढ़ सिर्फ एक शहर भर नहीं है, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का नए भारत के लिए देकः एक ऐसा सपना है जो देश की पुरानी सोच को बदलने का संकेत हो. ली कर्बुजिये ने वही बनाकर दे दिया, लेकिन यह रिटायरमेंट की दहलीज पर बैठे पुराने बाबू लोग नौकरी की फ़िक्र में घर से दफ्तर के रास्ते के अलावा इधर उधर देख ही नहीं पाए. गाँव- क़स्बा छोड़कर यहाँ सरकारी नौकरी के लालच में बैठे बाबुओं के इस शहर का जिओग्रफ़िया और आर्किटेचर न तो समझ आया और न ही रास आया.
खैर, अब यह है कि, ली कर्बुजिये के साथ काम कर चुके और पंजाब के पहले चीफ इंजिनीयर रह चुके एमएन शर्मा ने सेक्टर सतारां की इमारतों अपर रंग रोगन करने के खिलाफ आवाज़ तो उठाई है, शहर को यूनेस्को के हेरिटेज सिटी का दर्जा मिलने का वास्ता भी दिया है, देखते हैं, अकल कम करती है या ठेकेदारों की लॉबी.

Wednesday, February 10, 2010

दूर तक निगाहों में है गुल खिले हुए..




चंडीगढ़ में फिर से गुलों का मौसम आ गया है. शहर के बागों में फूल खिल उठे हैं...शहर के मशहूर रोज़ गार्डन में गुलाब खिलखिलाने लगे हैं. क्यारियों जैसे रंगोली बन गयी हैं. रोज़ गार्डन अब भी उतना ही खूबसूरत है जितना आज से दशकों पहले हुआ करता था. वही गुलाबों से सराबोर माहौल. पहली बार यह रोज़ गार्डन देखने का मौका कब मिला था यह तो ठीक से याद नहीं, शायद सत्तर के दशक के आखिरी सालों में जब हम चंडीगढ़ के बाशिंदे बने तब देखा था...लेकिन तब ध्यान रोज़ गार्डन में न होकर पास ही के खाली मैदान में चल रहे दिवाली मेले के झूलों में अटका था. अब तो वहां जगह नहीं बची है जहाँ वह दिवालो मेला लगा हुआ था. बस अड्डा बड़ा हो गया है, पास के खाली जगह को पहले सर्कस ग्राउंड कहते थे, लेकिन वहां भी आजकल कुछ बन रहा है शायद मल्टी-लेवल पार्किंग या कुछ और.
खैर, बात रोज़ गार्डन की हो रही थी. पहली बार अकेले यहाँ आने का मौका शायद '84 की फरवरी में मिला था. आठवीं के बोर्ड के इम्तिहान थे. सेंटर सेक्टर 23 का सरकारी स्कूल बना था. आखिरी पेपर शायद ड्राईंग का था. पेपर खतम होने की ख़ुशी और 'ड्राईंग में कौन सा पढ़ना होता है' की कहावत पर अमल करते हुए पेपर से दो दिन पहले ही स्कीम बना ली थी पेपर के बाद आवारागर्दी की. प्रोग्राम तो था सेक्टर 'सतारां' जाकर शहर की एकमात्र वीडियो गेम वाली दुकान 'वाईब्रेशन' पर कब से इकट्ठे किये हुए पांच रुपयों से मजे करने की. सो, पेपर में फ़टाफ़ट कलाकृतियाँ बनाकर भाग निकले हम. मेरे साथ तिरलोक ठुकराल से अलावा और कौन था, अब ठीक से याद नहीं..पुरानी बात हो गयी है. इतना याद है कि चार-पांच का ग्रुप था. सो, सेक्टर 23 से निकलकर सेक्टर 16 होते हुए जब हम जा रहे थे तो शायद मनीष का आइडिया था कि स्टेडियम के पीछे से कच्चे रास्ते से साइकलें चलाने का मज़ा लेते हुए वीरान रहने वाले शांति कुंज से शॉर्टकट मारेंगे. उन दिनों शांति कुंज एक जंगल से अधिक कुछ नहीं था जिसमे आदमकद घास लगी थी और बीच में से गुजरने वाले नाले के पास शराब पीने वालों ने पक्का ठिकाना बना रखा था..यह बातें भी हमें मनीष से ही पता लगी. बाद में मनीष ने अपने जीवन की पहली सिगरेट इसी पार्क में बैठकर पी थी...और यह भी कह था..'यार अगर इंजीनियरिंग में दाखिला मिल गया तो सिगरेट छोड़ दूंगा.. बाद में उसने नॉन-मेडिकल ही छोड़ दिया था.
तो बारास्ता शांति कुंज गुजरते हुए मैंने पहली बार रोज़ गार्डन देखा. उस से पहले किताबों में छपने वाली फोटो के लाल रंग वाले फूल को ही गुलाब समझता था. उस दिन देखा गुलाब न सिर्फ लाल था बल्कि पीला, सफ़ेद और दो-रंगा भी. उसका असर यह हुआ कि मैं और तिरलोक तो वहीँ रुक गए, लेकिन बाकियों को वीडियो गेम का मोह रोक नहीं पाया.
बाद में शायद एक-दो बार ही जा पाया रोज़ गार्डन में, लेकिन इसके बाहर से गुजरने वाले मध्य मार्ग से लगातार आना जाना होता रहा.
तीन दिन पहले एक केस के सिलसिले में हम सब घंटों से कोर्ट के सामने खड़े थे. अचानक राकेश गुप्ता ने सुझाव दिया कि सामने तक सैर करते हैं.. सैर करते हुए रोज़ गार्डन पहुंचे और पाया कि रोज़ गार्डन आज भी वैसा ही खूबसूरत है.
चंडीगढ़ के बाशिंदों के अलावा लोग शायद यह न भी जानते हों कि यह रोज़ गार्डन एशिया का सबसे बड़ा रोज़ गार्डन है..करीब 27 हज़ार वर्गफुट में फैला हुआ और इसमें गुलाब के 17 हज़ार से अधिक फूल हैं..वह भी कम से कम अढाई सौ किस्मों के...व्हाईट हॉउस, स्नो व्हाईट और किस ऑफ फायर जैसे नामों वाले.
हाँ..अब शांति कुंज भी संवर गया है..शायद शहर के सबसे अच्छे पार्कों में से एक...!! जिस पेड़ के नीचे मनीष ने उन दिनों की सबसे महंगी सिगरेट 'डनहिल' का पहला कश लिया था, उस पेड़ के आसपास अब फूलों की क्यारियां हैं..प्टुनिया के मुस्कुराते हुए फूल..!!

Wednesday, January 13, 2010

जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में...


रात को घर पहुंचा तो गाड़ी को घर तक ले जाने का रास्ता नहीं मिल सका. गली के मोड़ से लेकर घर तक के रास्ते में कम से कम चार जगह लोग आग जलाकर बैठे थे. कल लोहड़ी थी. रात को आग जलाकर बैठने और मूंगफली और रेवड़ियाँ खाने का त्यौहार. लेकिन सबके साथ मिलकर मनाने का त्यौहार. ऐसे नहीं एक मोहल्ले में चार जगह लोहड़ी जलाएं और पास-पड़ोस वालों को बुलाएं तक नहीं.
इस शहर में तो ऐसा नहीं था. कम से कम जैसा मुझे याद आता है, इस शहर में लोहड़ी एक ऐसा त्यौहार रहा है जिसे मनाने के लिए बाकायदा हर घर को बुलाया जाता था. यह उन दिनों को बात है जब शहर में कॉर्पोरेट कल्चर वाले लोग नहीं आये थे और न ही लोहड़ी मनाने के नाम पर एक-आध लकड़ी और पुराने गत्ते जलाकर वापस ऑफिस में जा बैठने की मजबूरियां इजाद हुई थी. चंडीगढ़ के सेक्टर 21 में रहा करते थे. उसी मोहल्ले में स्कूल था और एक चौगिरदे मोहल्ले में हम सब दोस्त और एक ही क्लास में पढने वाले बच्चे. लोहड़ी से एक महिना भर पहले ही हम सब लोहड़ी की तयारी शुरू कर देते थे. तैयारी का मतलब था कि जहाँ कहीं सूखी लकड़ी मिले उसे मोहल्ले के बीचोबीच बने पार्क में इक्कठा करना. 
तैयारियों के अलावा एक और चीज़ थी जिसे प्लानिंग कहते हैं. नयी शरारतें खोजने का पेटेंट रखने वाले लखन सिंह के दिमाग की उपज उस लोहड़ी पर यह थी कि पैंट में जेब लम्बी करने का जुगाड़. जुगाड़ कामयाब होने का तो कोई तरीका नहीं था.  फिर एक और स्कीम लगायी गयी. लोहड़ी की रात को जब पार्क में सब मिलकर लोहड़ी जलाते थे, तो मूंगफली की बोरी पास ही राखी होती थी. लखन की प्लानिंग उस बोरी में ही सेंध लगाने की थी. अब मुझे याद नहीं कि उसकी यह स्कीम भी कामयाब हुई थी या नहीं.
लोहड़ी से जुडी हुई एक और याद जो मुहे है, वोह है, लोहड़ी मांगने जाने का. बच्चे घर-घर जाकर लोहड़ी गाते थे और पैसे मांगते थे. घर के बाहर खड़े होकर 'सुंदर-मुंदरिये' लोकगीत गाने वाले बच्चों को पैसे मिलते थे. यह भी शायद लखन सिंह या नीरज शर्मा का आईडिया था कि लोहड़ी मांगने के लिए पिछले मोहल्ले में जाया जाये. चले गए. पांच-छः घरों से पैसे मिल चुके थे. सुझाव आया कि तीन-चार रुपये बहुत होते हैं, अब चला जाए, लेकिन सर्वसम्मति इस पर बनी कि बस एक आखिरी घर से और लोहड़ी ली जाए. हो गए शुरू. अचानक दरवाजा खुला और अन्दर से शायद  हमारी कोई टीचर बाहर निकल आयी. उन दिनों टीचर का बहुत खौफ होता था. पता नहीं क्यों? तो वह हुआ. टीचर को देखते ही भाग खड़े हुए, लोहड़ी के पैसे गिरने से बच गए थे. 
इसके बाद तय यह करना था कि पैसों का क्या किया जाए. इस पर सुझाव यह कि मेन रोड पारकर सेक्टर 22 में साईं स्वीट्स पर जाएँ और समोसे खाएं. लेकिन इतना  याद है कि समोसे की बजाय छैना लिया गया था. वो इडिया किस का था, ये भी याद नहीं. वह पहला मौका था कि मैं पहली बार किसी रेस्टोरेंट टाइप जगह में गया था. आज भी साईं स्वीट्स में चाय पीने के लिए जाता हूँ तो दुकान के दरवाजे से कुछ छोटे-छोटे बच्चे भागते हुए अन्दर आते हुए दिखते हैं. मिठाई वाले काउंटर तक भी नहीं पहुँचते...!! ऊपर समोसोंकी ट्रे रखी है. वेटर आकर चाय रखता है. मैं ऊपर देखता हूँ, वेटर पूछता है-साहब, लोहड़ी के लिए मिठाई पैक कर दूं?

Sunday, December 20, 2009

रहें ना रहें हम, महका करेंगे....



खबर तो मुझे बहुत पहले ही मिल गयी थी अखबारों से, लेकिन देखने जाने का वक़्त निकाल ही नहीं पाया. और कल जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि मेरी यादों में इक्कीस साल तक बसा रहा वो टावर अब नहीं रहा. और तभी मुझे समझ आया कि यह टावर यादों में तो असल में आएगा अब ही.
यही तावेर जिसकी तस्वीर आपदेख रहे हैं, अब नहीं है. जैसा कि आप दूसरी तस्वीर में देख पा रहे हैं. खबर यह है कि बिजली की तारों में शॉर्ट सर्किट हो जाने के कारण इसमें करवा चौथ की रात आग लग गयी और चाँद देखने आयी संक्दों औरतों की मौजूदगी में टावर खाक हो गया. जले हुए टावर के अवशेष हटा दिए गए हैं. इसे फिर से नहीं बनाये जाने के पीछे सरकारी अफसरों के जो भी तर्क हों, मेरा तर्क है कि आवारगी के शुरूआती दौर कि मेरी यादों के साथ जुड़े रहे इस टावर को मैं बहुत याद करूँगा.
यह बात 1988 की है जब हम नए नए कालेज जाने लगे थे. बोटनी क्लास का लेक्चर बंक करके झील पर जान शुरू किया था. और तभी से झील के बीचोबीच बने टापू पर जाने की इच्छा उठी. वहां जाना मना था. टापू पर जाने का एक ही तरीका था और वह था किश्ती से जाना. लेकिन किश्ती टापू के पास रुकते ही सुखना झील के गार्ड मोटरबोट लेकर आ पहुँचते. टापू पर जाने की इच्छा बढती जा रही थी.
खैर, उन्हीं दिनों चंडीगढ़ की सुखना झील में आल इंडिया रोइंग चैम्पियनशिप हुयी थी. झील के आखिरी छोर तक देखने के लिए झील के बीचोबीच बने टापू पर यह निगरानी टावर बनाया गया था. और टापू पर जाने के लिए किश्तिओं को एक लाइन में खड़ा करके उनके ऊपर से पुल बनाया गया. लेकिन वहां जाने की इजाजत सिर्फ स्पोर्ट्स से जुड़े लोगों को ही थी. चूँकि पंजाब में आतंकवाद का दौर चल रहा था, सो इस पुल की सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ तैनात की गयी थी. एक दो बार कोशिश की पुल पार करके टावर पर जाने की, लेकिन सीआरपीएफ वालों ने भगा दिया.
जिस दिन चैम्पियनशिप ख़त्म हुयी, उस दिन चहल-पहल में मौका मिल गया और मैं टापू पर जा पहुँच. टावर के ऊपर तक जाने का मौका भी हाथ लग गया. वहां से सुखना झील समंदर सी लगी. टावर के ऊपर खड़े होकर पानी देखने से लगा जैसे जहाज में बैठे हों. बस उसी दिन से उस टावर के साथ मेरी यादें जुड़ गयी. हालांकि मैं उसपर दुबारा नहीं जा सका.
चैंपियनशिप तो एक हफ्ते में ख़त्म हो गयी, लेकिन टावर को नहीं हटाया गया, और वक़्त के साथ टावर सुखना के साथ जुड़ गया. एक पहचान के तौर पर. हज़ारों लोगों ने इसके फोटो लिए और सुखना पर आने की याद बनाया. अब नहीं है. अब यादें हैं.

Wednesday, October 7, 2009

मेरी आवाज़ ही पहचान है...गर याद रहे..!!



येही आवाज़ थी जो सत्तर के दशक के हम बच्चों को घरों से बाहर खींच लाती थी. गर्मी की छुटियों में जब धुप में बाहर न निकलने की सख्त हिदायत होती थी और मैं घर की खिड़की से लगा बैठा रहता था इस उम्मीद में कि पास में रहने वाले मनीष सिंगला, नीरज शर्मा, केनेथ डी'सूज़ा या लखन सिंह में से कोई खेलने के बुलाने आ ही जाये. तभी कहीं से यह आवाज आती थी और घर से बाहर निकलने का बहाना मिल ही जाता था. 'ला...लाला लाला लाला, मेरे अंगने में..' लावारिस फिल्म के इस गाने की पहली लाइन सुनते ही गली में रहने वाले सभी बच्चों को सिग्नल मिल जाता कि 'बाहर निकलने और खेलने की स्कीम बनाने का बहाना मिल गया.
ये आवाज़ थी बाईस्कोप की. दूर गली के मोड़ पर उसके भोंपू से गाने सुनते ही बीस पैसे की मांग शुरू हो जाती. असल में वह बाईस्कोप पर फोटो वाली फिल्म दिखाने के तो दस पैसे ही लेता था पर कभी-कभार किसी दोस्त के लिए 'एडजस्टमेंट' करने के चक्कर में 'दस्सी' ज्यादा रखनी पड़ती थी.
चंडीगढ़ जैसे बसते हुए शहर में उन दिनों मनोरजन के साधन बहुत नहीं थे. मनोरंजन के नाम पर लोग सुखना झील या रोज़ गार्डेन में घूमते थे या बहुत हुआ तो सेक्टर 17 के नीलम, जगत या 'केसी' सिनेमा में 'त्रिशूल', 'मुक्कदर का सिकंदर' या 'कुर्बानी' जैसी फिल्म देखने के लिए टिकेट मिल जाने की किस्मत आजमाने चले जाते.
रही बात बच्चों की तो, स्कूल के बाद का दिन तो शरारतों के लिए ही कम पड़ता था. हाँ, गर्मी की छुटियों में दिन काटना समस्या थी. उन दिनों टेलीविजन के प्रोग्राम के नाम पर भी शाम को चित्रहार और रविवार की सुबह 'स्टारट्रेक' ही आता था. दिन में घर से बाहर निकलकर कंचे खेले जा सकते थे, लेकिन उसके लिए इजाज़त लेने के लिए कहते ही एक 'स्टेनडर्ड' जवाब सुनना पड़ता था कि 'कोई और बच्चा नज़र आ रहा है बाहर?' ऐसे में बाईस्कोप वाले की आवाज़ बड़ी राहत देती थी की इस बहाने सब बच्चे बाहर आ जायेंगे और स्कीम बना लेंगे कि आधे घंटे बाद बारी-बारी से सभी के घर जाकर गुजारिश करनी है कि-'आंटी, इसे भेज दो खेलने..'
लिहाजा, बाईस्कोप से बचपन का जो नाता जुड़ा उसे मैं या उन दिनों मेरी उम्र के बच्चे ही महसूस कर सकते हैं. वक़्त के साथ शहर बदला, शहर का जियोग्राफिया, शहर के बाशिंदे और उनकी जरूरतें. शीशे के कमरे वाले दफ्तर हैं जहाँ से बाहर की आवाजें मुज तक नहीं पहुँचती. लैपटॉप पर काम करते हुए वर्ल्डस्पेस रेडियो पर में 'कुर्बानी' फिल्म का 'नसीब इंसान का चाहत से संवरता है..'सुनते हुए अचानक मैंने बाहर देखा तो यकीन नहीं हुआ, एक बाईस्कोप वाला सामने के पेड़ के नीचे खडा था, अब इसे कहाँ से मेरी याद आ गयी तीस साल बाद..!!!
मैं फ्लेशबैक में चला गया..गर्म दोपहरियों में वो सुनसान गलियों में दौड़ते आते बच्चों का एक 'सेपिया कलर' की कुछ सेकंड की फिल्म. भागते बच्चे कचनार के पेड़ के नीचे खड़े बाईस्कोप वाले के इर्द-गिर्द जमा हैं, कुछ अपनी बारी के इंतज़ार में. कुछ बारी पक्की करने के लिए हथेली में 'दस्सी' का सिक्का पहले ही बाईस्कोप वाले को देने के लिए उछलते हुए..और कुछ 'अडजस्टमेंट' करते हुए बारी-बारी से बाईस्कोप के भीतर झांकते हुए..!!
..कहीं यह बाईस्कोप वाला हमें तो नहीं ढूंढ रहा,?? मनीष, नीरज, केनेथ डी' सूज़ा...जल्दी आओ, वो आ गया है..!! मनीष न्यूयार्क में, नीरज गुडगाँव में कहीं, कैनेथ साउथ में शायद...!!! तभी मोबाईल पर घर से फोन- पापा, मैं बाहर खेलने जाऊं??' और मेरा जवाब-'बेटा, और कोई बच्चा नज़र आ रहा है बाहर?'''