इक शहर था, वो क्या हुआ...

चंडीगढ़ को मैंने जवान होते देखा है...मेरे साथ-साथ ही बड़ा हुआ है. मैं इसकी नब्ज़ को पहचानता हूँ. इसके चौक-चौराहों और बाजारों को आबाद होते तो देखा ही है, इसकी पहचान इसके चौराहों को ख़त्म होते भी देख रहा हूँ. इसी शहर से जुडी कुछ यादें और बातें....

Monday, June 29, 2009

छोटी सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं तुम...

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...कहीं तो मिलोगे.....बिलकुल यही हुआ मेरे साथ. बीते रविवार शिमला के इंदिरा गाँधी मेडिकल कालेज के 'बी ब्लाक' से निकलते ही मेरी नज़र पड़...
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Saturday, June 13, 2009

लहरों की तरह यादें, दिल से टकराती हैं...

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पता नहीं क्यों बोटनी, यानी वनस्पति विज्ञान (जिसे 'इन्टेलीजेंसिया इग्नोरेंस' से ग्रसित मुझ जैसे विद्यार्थी घास-पत्ता विज्ञान कहते थे)...
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Thursday, April 23, 2009

न उड़ा यूं ठोकरों से मेरी ख़ाक-ऐ-कब्र....

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ख़ुशी इस बात से हुई कि पिछले दिनों चंडीगढ़ प्रशासन ने सेक्टर 19 में बनी उस पुरानी बिल्डिंग का हुलिया बदलकर उसे चंडीगढ़ का नक्शा बनाने वाले आ...
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Thursday, March 26, 2009

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता....

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इन दिनों चंडीगढ़ में रंगों की बहार है. हर तरफ रंग भरी फिजाएं हैं. पेड़ों से रंग बरस रहे है। दुनिया का तो मुझे नहीं पता, लेकिन इतना जरूर है कि...
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Sunday, March 22, 2009

कुछ ख़ास है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

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अगर यह संयोग है, तो इससे बड़ा कोई संयोग नहीं हो सकता कि एक अत्याधुनिक शहर बसाने के लिए भवन निर्माण कला के जिस पश्चिमी मॉडल को 'लेटेस्ट...
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Thursday, March 19, 2009

रौशनी है शराबखानों की........

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शहर -ए-चरागाँ में अब ए दोस्त, रौशनी है शराबखानों की... असल में अब यही हाल है इस शहर का जिसकी गलियाँ चमचमाते दुधिया रंग की रौशनी से लबरेज रहत...
Saturday, March 14, 2009

फिज़ा के भेस में गिरते हैं पत्ते चिनारों के....

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'कुछ तो तेरे प्यार के मौसम ही रास मुझे कम आये, और कुछ मेरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी'। पत्थरों के इस शहर में कुछ ऐसी ही रोमानियत ल...
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dr ravi sharma
'कुछ तो तेरे प्यार के मौसम ही मुझे रास कम आए, और कुछ मेरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी'. बस यही है मेरी फितरत. कुछ ही लोग मेरे दिल और दिमाग तक पहुँच पाते हैं. वैसे तो किसी शायर ने कहा है कि 'परखना मत, परखने से कोई अपना नहीं रहता', लेकिन मेरी आदत है छोटी छोटी बातें पकड़ना और उनका विश्लेषण करते रहना. और बगावती मिट्टी से पैदा हुई सोच का ही नतीजा है कि डाक्टरी की प्रेक्टिस छोड़कर पत्रकार बन गया...!!! रास तो खैर यह भी नहीं आ रहा.
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